भूमि सर्वेक्षण

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श्री. सचिन जोशी गुरुजी

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स्वर्णगन्धा सुरसा धनधान्यसुखा वहा । व्यत्यये व्यत्ययफला अतः कार्यं परीक्षणम् ॥

अर्थ: सुगंधी आणि सुपिक जमीन धन-धान्य व सुख प्रदान करते, तर दोषयुक्त जमीन संकट आणते. म्हणून वास्तू बांधण्यापूर्वी भूमीचे परीक्षण अवश्य करावे.

भूमि सर्वेक्षण क्या है?

भूमि सर्वेक्षण, जिसे वास्तु शास्त्र भूमि सर्वेक्षण भी कहा जाता है, एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसके माध्यम से किसी भूमि या भूखंड को खरीदने या निर्माण कार्य प्रारंभ करने से पहले उस स्थान की ऊर्जा, दिशाओं और स्थानीय कारकों का अध्ययन किया जाता है।

वास्तु शास्त्र के अनुसार, यह प्रक्रिया उस स्थान की सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जाओं की पहचान करने में सहायक होती है। इसमें विभिन्न तत्वों का विश्लेषण किया जाता है ताकि भविष्य में होने वाले संभावित लाभ या हानि को समझा जा सके।

उचित भूमि सर्वेक्षण से भविष्य के वास्तु दोषों से बचाव संभव होता है और निर्माण कार्य को अधिक सुरक्षित, संतुलित और शुभ बनाया जा सकता है।

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भूमि परीक्षण का महत्व

मिट्टी का विश्लेषण महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि उचित स्थल विश्लेषण घर, कार्यालय या अन्य भवन में सकारात्मक ऊर्जा लाने में सहायक होता है। यह जीवन के सभी क्षेत्रों में समृद्धि, सुख, शांति और सफलता प्राप्त करने के लिए आवश्यक है। इससे शारीरिक, मानसिक और आर्थिक स्थिति बेहतर हो सकती है।


भूमि परीक्षण से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह। घर या कार्यालय के निर्माण की शुरुआत में उचित मार्गदर्शन। वास्तु दोषों से बचाव और उनका निवारण। घर में ऊर्जा का संतुलन बनाए रखना। किसी भी नकारात्मक प्रभाव से सुरक्षा। मानसिक शांति और शारीरिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देना।

भूमि सर्वेक्षण प्रक्रियाएँ

भूमि सर्वेक्षण की प्रक्रिया कुछ महत्वपूर्ण चरणों में की जाती है। इस प्रक्रिया में निम्नलिखित पहलुओं का अध्ययन किया जाता है:

भूमि का सर्वेक्षण पहले चरण में भूखंड का स्थानीय सर्वेक्षण किया जाता है। इसमें भूखंड की आकृति, दिशा, हवा का प्रवाह, सूर्य की दिशा, जल विज्ञान, नदियाँ, बांध और अन्य भौगोलिक कारकों का अध्ययन शामिल होता है। सलाहकार स्थल पर जाकर भूमि के सभी पहलुओं की जांच करता है।
दिशाओं का अध्ययन (दिशा विश्लेषण) वास्तु शास्त्र के अनुसार प्रत्येक दिशा और उससे संबंधित ग्रह या देवता उस दिशा की ऊर्जा को प्रभावित करते हैं। उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम दिशाओं का विशेष अध्ययन किया जाता है। पूर्व दिशा: सूर्य का प्रवेश, समृद्धि और स्वास्थ्य। दक्षिण दिशा: स्थिरता, सुरक्षा और ऊर्जा। उत्तर दिशा: व्यापारिक सफलता और प्रगति। पश्चिम दिशा: चंद्रमा से संबंधित, मानसिक शांति के लिए शुभ।
ग्राउंड एनर्जी चेक (ऊर्जा विश्लेषण) भूमि की ऊर्जा की जांच करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह देखा जाता है कि स्थान की ऊर्जा सकारात्मक है या नकारात्मक। इसके लिए रेडियोमीटर (पारंपरिक उपकरण), लैंडसैट छवियाँ या अन्य आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है।
वास्तु दोष विश्लेषण कभी-कभी भूमि या भूखंड में वास्तु दोष हो सकते हैं, जो निर्माण पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। कुछ सामान्य दोष: भूखंड की अनियमित या अप्रत्यक्ष दिशा। अत्यधिक तेज हवाएं या सूर्य प्रकाश की कमी। एक ही स्थान पर नकारात्मक ऊर्जा का केंद्र। जमीन पर अनावश्यक दीवार या संरचना।
सकारात्मक ऊर्जा प्रवाह भूमि का निरीक्षण कर सकारात्मक ऊर्जा प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त उपाय सुझाए जाते हैं। इसमें घर के निर्माण के लिए सही स्थान का चयन और प्रत्येक भाग का उचित निर्धारण शामिल है।
नवीन समाधान (उपचार) जिन स्थानों पर दोष या नकारात्मक ऊर्जा होती है, उनके लिए उपाय सुझाए जाते हैं। इनमें वास्तु यंत्र, रुद्राक्ष, रत्न, हनुमान चालीसा या अन्य सरल उपाय शामिल हो सकते हैं, जिससे नकारात्मक ऊर्जा कम और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।
यज्ञाची प्रमुख अंगे
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भूमि सर्वेक्षण संबंधी सुझाव

भूमि सर्वेक्षण करते समय ध्यान रखने योग्य बातें:

स्थान की पूर्व तैयारी:
परीक्षण से पहले जमीन पूरी तरह से साफ और अवरोध रहित होनी चाहिए।
नई जमीन खरीदते समय:
वास्तु शास्त्र के अनुसार सही दिशा, आकार और आसपास के वातावरण की जांच अवश्य कर लें।

भूमि सर्वेक्षण से जुड़ी विशेष बातें

आपकी कुंडली से संबंधित:

भूमि सर्वेक्षण करते समय अपनी जन्म कुंडली का अध्ययन करें, क्योंकि कुंडली में स्थित ग्रह और उनकी संरचना संबंधित क्षेत्र पर प्रभाव डाल सकती है।

मन्नतों से संबंधित भूमि का निरीक्षण:

उस स्थान पर कुछ नकारात्मक ऊर्जाएं हो सकती हैं। इसके लिए स्थानीय रीति-रिवाजों, परंपराओं और पूजे जाने वाले देवी-देवताओं की जानकारी अवश्य प्राप्त करें।

भूमि पूजन क्यों किया जाता है?

  • धरती माता का आशीर्वाद: किसी भी नए कार्य की शुरुआत करते समय भूमि का सम्मान करना और उसकी अनुमति लेना।
  • वास्तुदोष निवारण: स्थान की नकारात्मक ऊर्जा दूर होकर वहाँ सात्विकता का निर्माण होता है।
  • कार्य में निर्विघ्नता: निर्माण कार्य के दौरान कोई बाधा न आए और कार्य समय पर पूर्ण हो, इसके लिए प्रार्थना की जाती है।
  • सुख-समृद्धि: उस भवन में रहने वाले लोगों को दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और धन-संपत्ति की प्राप्ति होती है।

शास्त्रीय आधार

  • भूमि केवल मिट्टी नहीं है, बल्कि वह अनंत शक्तियों का केंद्र मानी जाती है।
  • गृह निर्माण से पहले भूमि पूजन करना गृहस्थ का परम कर्तव्य माना गया है।
  • पूजन से वास्तु पुरुष प्रसन्न होते हैं और घर को वास्तविक ‘घरपन’ प्राप्त होता है।

पूजन के मुख्य विधि

गणपति एवं कलश पूजन

किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत विघ्नहर्ता भगवान गणपति के आशीर्वाद और वरुण देव (कलश स्थापना) से की जाती है।

भूमि शुद्धिकरण एवं षट्कर्म

मंत्रोच्चार द्वारा भूमि का शुद्धिकरण किया जाता है तथा वहाँ उपस्थित अदृश्य शक्तियों को संतुष्ट किया जाता है।

वास्तु पुरुष एवं नाग पूजन

वास्तु पुरुष की प्रतिमा तथा चांदी का नाग भूमि में अर्पित किया जाता है, जिससे भवन की नींव मजबूत और सुरक्षित बनी रहे।

शिलान्यास (पहली ईंट रखना)

शुभ मुहूर्त में निर्माण कार्य की पहली ईंट या पत्थर रखकर वास्तु की विधिवत नींव डाली जाती है।